रविवार, 7 जून 2009

चंद रुपयों के खातिर जमीर बेचते पत्रकार

पत्रकारिता को समाज का आइना कहा जाता है.एक ऐसा आइना जो प्रतिदिन समाज के लोगों को सामाजिक, राजनितिक और आर्थिक गतिविधि से रूबरू कराती है.  लेकिन आज की पत्रकारिता के आईने में लोभ और स्वार्थ के धुल  की परत चढती  जा रही है. आज के कुछ पत्रकार पत्रकारिता को सेवा की जगह धंधा बना लिए हैं.
दिन भर घर में घुंस कर मक्खियाँ मारने वाले कुछ पत्रकार ऐसे भी हैं जो किसी गरीब को कुछ हो जाये तो हुंह खबर नहीं जायेगा कह कर घर में हीं पड़े रहेंगे. लेकिन अगर कंही किसी सरकारी योजना में गड़बड़ी की गंध आ जाये तो बरसते पानी में भी दौड़ पड़ेंगे. ऐसा नहीं की न्यूज़ भेज कर सम्सज को जगाने के लिए दौड़ते हैं. बल्लिक  इन्हें उसमे से कमाई की महक मिल जाती है. ठेकेदार ने इनके जेब भर दिए. फिर तो क्या है वह गड़बड़ योजना भी सही हो जाएगी. भले हीं उसकी जमीनी हकीकत कुछ और हो.  
चन्द रुपयों के लिए अपने जमीर को नीलम कर देने वाले ऐसे पत्रकार हीं आज पत्रकारिता जगत के कोढ़ बने बैठे हैं.

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