बिल्ली के भाग्य से छींका टूटता है. बचपन से ये कहावत सुनता आ रहा था. लेकिन इस कहावत की हकीकत पंचायत चुनाव की गहमागहमी शुरू होने के बाद पता चली. किस तरह बिल्ली का भाग्य जगता है और छींका टूटता है. पंचायत चुनाव आते हैं सिमडेगा बार कौंशिल के वकील रूपी बिल्ली के भाग्य जाग गए और चुनाव के नामांकन के दौरान रोज दिन उनके लिए छींके टूट रहे हैं.
सामान्य दिनों में दिन भर मक्खियाँ मरने वाले काले कोट धारी वकीलों की पंचायत चुनाव आते हीं किस्मत कुल गई. दूर दराज गाँव में बसने वाले सीधे साढ़े आदिवाशी ग्रामीण ३२ वर्षों के बाद होने वाले पंचायत चुनाव को लेकर काफी उत्साहित हैं. लेकिन अब तक चुनाव के पचड़े से कोसों दूर रहे ये ग्रामीण चुनावी तौर तरीके से बिलकुल अनजान हैं. इस विकत परिस्थिति में इन्हें तारणहार के रूप में सिर्फ काले कोट पहने कानून के खिलाडी हीं नजर आ रहे हैं.
अपने दिलों में चुनाव लड़ कर गाँव का विकास करने की तम्मना संजोये गाँव की सरकार में सामिल होने वाले उम्मीदवार जब अपनी समस्या रूपी नामांकन के कागजात लेकर इन वकीलों के पास उसे दुरुस्त करने पंहुच रहे हैं तो ये वकील उनसे अफिड़ेवित और कागजात दुरुस्त करने के नाम पर ३०० से ५०० रुपये तक वसूल कर रहे हैं. अब वकीलों की इस तरह की नाजायज मैंग को सुन कर , चुनाव लड़ कर गाँव की सुधार का सपना देखने वाले बेचारे गरीब प्रत्यासी या तो अपने सपने को गरीबी की आग में झोंक कर चुनाव लड़ने का अपना फैसला बदल कर मायूस लौट जा रहे हैं. या फिर साहूकारों की की चोखट चाट कर अपने सपने को साकार करने के लिए कानून के खिलाडियों को नाजायेज पैसे दे रहे हैं.
कानून के काले कोट धारी ये खिलाडी भी पंचायत चुनाव को किसी त्यौहार की तरह मान कर अपनी पौ बारह करने के लिए नाजायेज कमाई धड़क्ले से कर रही हैं.
ashish shastri simdega 9334346611

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