मंगलवार, 2 नवंबर 2010

जमीन से जुडी है झारखंडी संस्कृति

झारखण्ड की माटी में नाचते पेड़ 
झारखण्ड की लोक कला और संस्कृति जमीन से जुडी हुई है. जनजातीय सभ्यता बाहुल्य होने के कारण लोग अपनी भावनाओं को अभिब्यक्ति लोक कथाओं के माध्यम से करते हैं, जो कलांतर में परिपाटी, और यंहा के लोगों की अभिन अंग बन गई है. सांस्कृतिक गतिबिधियों को लोक कथाओं का रूप मिलता चला गया. जिसे यंहा के आदिवासी अपनी परंपरा में समाहित करते गए.  झारखण्ड के लोक कलाओं में छऊ नृत्य का नाम सर्वोपरी है. मयुरभंज शेली से अलग हटकर सरायकेला छऊ ने झारखण्ड का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम किया है. यह नृत्य मुख्यतः युद्ध कलाओं पर आधारित है.
सिमडेगा की माटी में पाई जाने  वाली राटा  नृत्य का भी अपना अलग महत्व  है . खुद  से  बांस की बाध्य यन्त्र बना कर उसे बजाते हुए उसकी धुन पर नृत्य करना अपने आप में अनोखा कला है. इसी तरह चोपलों में की जाने वाली पैका नृत्य की भी अपनी अलग छवि है . अंगिका अभिनय में यह शैली सभी झारखंडी शैली की समायोजन के जैसे है.
वंही झारखण्ड के दक्छिनी छोटानागपुर सिनगी दई और कयेली  दई की स्मृति में उराँव्  समाज में जनि शिकार का उत्सवा मनाया जाता है. इसमें  उराँव्  स्त्रियाँ पुरुष  वेश में शिकार करने निकलती हैं. इस शिकार में दुश्मनी का प्रतिक मने जाने वाले वन पशु मारे जाते हैं.
झारखण्ड में मुर्गा लड़ाई को पुरातन संस्कृति धरोहर के रूप में दर्जा प्राप्त है. यंहा के ग्रामीण इलाकों में शायद हीं कोई ऐसा घर होगा जो इस खेल में रूचि नहीं रखता हो. अगहन संक्रांति के प्रारंभ होते हैं सम्पूर्ण इलाके में यह परम्परागत खेल प्रारंभ हो जाता है.

ashish shastri simdega ९३३४३४६६११

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