मेरे भी सपने थे की मैं आसमान छु लूँ लेकिन सहारे वाले दो हाँथ न मिले.
मैं भी चाहता था की और बच्चो की तरह खेलूं लेकिन ममता के आँचल के छांव न मिले.
शायद यही कहती है उन बच्चो की की नाम आँखें जिनका बचपन कचरे की ढेर में खो जाता है. नाजुक उम्र में जिमेदारियों का बोझ उठाये इन मासूमों को क्या मालूम की बचपन क्या होता है. ये तो आँख खुलते हीं सुबह से शाम तक भोजन के लिए कचरों मैं जूठन तलाश करते रहते हैं. या फिर किसी के जूठे बर्तन धो कर अपनी पेट की आग बुझाते हैं.
सरकार ने ऐसे गरीब और अनाथ बच्चों के लिए सर्व शिक्च्छा अभियान और मध्यान भोजन जैसे कई स्वर्णमयी योजनाये चलाई है. लेकिन ये योजनाये धरातल पर कितनी उतरी है. इसका अंदाजा तो सिमडेगा के इस मासूम की आँखों को देख कर आसानी से लगाया जा सकता है. ये तो महज एक बानगी है ऐसे हीं जाने कितने मासूम देश के हार कोने में कचरों में बैठे भोजन की तलाश करते रहते हैं. जिसे अनदेखा कर समाज और देश के ठेकेदार निकाल जाते होंगे.
ऐसे गरीबों के प्रति जनप्रतिनिधियों के बड़ी बड़ी बातें मंच की भीड़ से उतर कर क्या कभी इन गरीबों तक भी पंहुचेगी या फिर इनके भविष्य को सुधरने के लिए किसी मसीहा को हैं आना पड़ेगा.
ashish shastri simdega 9334346611
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